परिवर्तन कविता का सारांश

परिवर्तन 



सुमित्रानन्दन पंत
 


अहे निष्ठुर परिवर्तन!

तुम्हारा ही ताण्डव नर्तन

विश्व का करुण विवर्तन!
तुम्हारा ही नयनोन्मीलन    
निखिल उत्थान, पतन !
अहे वासुकि सहस्त्र फन!
लक्ष्य अलक्षित चरण तुम्हारे चिन्ह निरंतर
छोड़ रहे हैं जग के विक्षत वक्षस्थल पर!
शत शत फेनोच्छ्वासित, स्फीत फुतकार भयंकर
घुमा रहे हैं घनाकार, जगती का अम्बर!
मृत्यु तुम्हारा गरल दन्त कंचुक कल्पान्तर,
अखिल विश्व की विवर
वक्र कुंडल
दिग्मंडल!
             २
आज कहाँ वह पूर्ण-पुरातन, वह सुवर्ण का काल?
भूतियों का दिगंत-छवि-जाल,
ज्योति-चुम्बित जगती का भाल?
राशि-राशि विकसित वसुधा का वह यौवन-विस्तार?
       स्वर्ग की सुषमा जब साभार
      धरा पर करती थी अभिसार!
      प्रसूनों के शाश्वत-श्रृंगार,
      (स्वर्ण-भृंगों क्र गंध-विहार)
     गूँज उठते थे बारंबार
     सृष्टि के प्रथमोद्गार!
     नग्न-सुन्दरता थी सुकुमार,
     ऋद्धि ओ'सिद्धि अपार!
अये, विश्व का स्वर्ण-स्वप्न, संसृति का प्रथम-प्रभात,
कहाँ वह सत्य, वेद-विख्यात?
दुरित, दुःख, दैन्य न थे जब ज्ञात,
अपरिचित जरा-मरण-भू-पात!
           ३
अह दुर्जेय विश्वजित!
नवाते शत सुखर नरनाथ
तुम्हारे इन्द्रासन-तल माथ;
घूमते शत-शत भाग्य अनाथ,
सतत रथ के चक्रों के साथ!
तुम नृशंस से जगती पर चढ़ अनियंत्रित,
करते हो संसृति को उत्पीड़न,पद-मर्दित,
नग्न नगर कर,भग्न भवन, प्रतिमाएं खंडित
हर लेते हो विभव, कला, कौशल चिर-संचित!
आधि, व्याधि, बहुवृष्टि, वात, उत्पात, अमंगल
वह्नि, बाढ़, भूकम्प --तुम्हाते विपुल सैन्य दल;
अहे निरंकुश! पदाघात से जिनके विह्वल
हिल-इल उठता है टलमल
पद-दलित धरातल!
     ४
जगत का अविरत हृतकंपन
तुम्हारा ही भय-सूचन;
निखिल पलकों का मौन पतन
तुम्हारा ही आमंत्रण!
विपुल वासना विकच विश्व का मानस-शतदल
छान रहे तुम कुटिल काल-कृमि-से घुस पल-पल;
तुम्हीं स्वेद-सिंचित संसृति के स्वर्ण-शस्य-दल
दलमल देते वर्षोपल बन, वांछित कृषि फल!
अये, सतत ध्वनि स्पंदित जगती का दिग्मंडल
नैश गगन-सा सकलतुम्हारा ही समाधिस्थल!         




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