शमशेर बहादुर सिंह
एक पीली शाम : शमशेर बहादुर सिंह
एक पीली शाम
पतझर का जरा अटका हुआ पत्ता
शांत
मेरी भावनाओं में तुम्हारा मुखकमल
कृंश ग्लान हारा-सा
( कि मैं हूं एक मौन दर्पण में
तुम्हारे कहीं ?)
वासना डूबी
शिथिल पल में
स्नेह काजल में
लिए अद्भुत रूप - कोमलता
अब गिरा अब गिरा वह अटका हुआ आंसू
सांध्य तारक - सा
अतल में |
{ शमशेर बहादुर
सिंह }
कविता का सारांश
"एक पीली शाम" कविता का कवि शमशेर
बहादुर सिंह जी है। सिंह जी कविता के शिल्प या टेक्नीक पर अधिक बल देते
है। एक पीली शाम कविता में शमशेर जी
ने सुन्दर बिम्ब की अभिव्यक्ति की है | कवि ने जीवन जगत की सत्चाई को एक काव्य बिम्ब के द्वारा
संकेत किया है | कविता में एक पीली शाम का चित्र है | पीली शाम है, पतझर का मौसम है और एक पत्ता टूट गया है लेकिन गिरने
के पूर्व जरा - सा कहीं अटका हुआ है | और वह बिल्कुल शांत है |
शमशेर मौत
के करीब जाते हुए व्यक्ति के उन भावों को व्यक्त कर रहे हैं जो कि मृत्यु की ओर
बढ़ रहा है। साथ ही शमशेर उस भावनाओं को भी व्यक्त कर रहे हैं कि मौत के करीब जानेवाला वह व्यक्ति कवी की प्रेयसी है | वस्तुत: प्रकृति की पीली शाम और मृत्यु से
पहले की कृश, म्लान, हारा सा मुखकमल एक
समान हैं। जिस प्रकार पतझर का पत्ता बस अटका हुआ है उसी प्रकार कवि की प्रेयसी का
जीवन भी अटका हुआ है।
'पीली शाम' निस्तेज का प्रतीक है | जीवन के वृद्धावस्था का आभास देती है | शाम प्रतीक है सूर्यास्त का और अंधकार के शुरू होने का | उस पर पतझर है, पत्ते का गिरना निःसंग होना, असंपृक्त होना , परंतु उसमें बेचैनी नहीं, शांति है | यहा कवि दु:ख में भी अतीत के सुखमय जीवन को याद करते हैं। कवि मौत की ओर बढ़ रहे अपनी प्रेयसी के चेहरे पर सुंदरता देख रहे हैं | जिस प्रकार सूर्यास्त के वक्त कमल का मुख बंद हो जाता है उसीप्रकार उसका मुरझाना तय है | कवि कहते हैं कि मेरी भावनाओं में , विचारों के अंतर्गत तुम्हारा मुखकमल से सुख दिखाई देता है परंतु वह म्लान है हारा- सा है। क्योकि वह सुख आज मौन दर्पण अर्थात यादों में बसा हुआ है। सत्चाई तो यह है कि वह सुख रूपी वासना आज शिथिल पल में छीप गई है और स्नेह अन्धकार में परिर्वतित होगया है।कवि के पास आज कुछ हैं तो वे सिर्फ अतीत की मधुर यादें हैं।
'पीली शाम' निस्तेज का प्रतीक है | जीवन के वृद्धावस्था का आभास देती है | शाम प्रतीक है सूर्यास्त का और अंधकार के शुरू होने का | उस पर पतझर है, पत्ते का गिरना निःसंग होना, असंपृक्त होना , परंतु उसमें बेचैनी नहीं, शांति है | यहा कवि दु:ख में भी अतीत के सुखमय जीवन को याद करते हैं। कवि मौत की ओर बढ़ रहे अपनी प्रेयसी के चेहरे पर सुंदरता देख रहे हैं | जिस प्रकार सूर्यास्त के वक्त कमल का मुख बंद हो जाता है उसीप्रकार उसका मुरझाना तय है | कवि कहते हैं कि मेरी भावनाओं में , विचारों के अंतर्गत तुम्हारा मुखकमल से सुख दिखाई देता है परंतु वह म्लान है हारा- सा है। क्योकि वह सुख आज मौन दर्पण अर्थात यादों में बसा हुआ है। सत्चाई तो यह है कि वह सुख रूपी वासना आज शिथिल पल में छीप गई है और स्नेह अन्धकार में परिर्वतित होगया है।कवि के पास आज कुछ हैं तो वे सिर्फ अतीत की मधुर यादें हैं।
कवि ने यहाँ मृत्यु के
सामने जीवन की लालसा को हारते हुए दिखाया है | नेत्रों में जीने की इच्छा
मौजूद है | मृत्यु के क्षण में भी शमशेर सुंदर रूप को स्थान देते है , जीवन की भांति मृत्यु भी
खूबसूरत है |
कवि कहते है
कि किसी भी क्षण मृत्यु आ सकती है , कब आँसू गिरेगा पता नहीं , लेकिन इसके
गिरने का समय आ गया है | पत्ते और
आँसू में साम्यता है | गिरना यहा मृत्यु आ जाना है तथा उस अनन्त में खो जाना है, जहां से कोई वापस नहीं आता है।
इस प्रकार
कवि शमशेर जी जीवन के सत्य को प्रकृति के बिम्ब से प्रस्तुत करते है।
अतः हम निष्कर्ष रूप में यह कह सकते हैं कि सबको एक दिन यह पृथ्वी
छोड़ कर जाना है।यही नियति है।दिन के बाद रात आयेगा, पतझड़
के बाद नये पत्ते खिलेगा।दु:ख
तो होता है पर नया आभास भी आता है।
शमशेर बहादुर सिंह जीवनी - Biography of Shamsher Bhadur Singh in Hindi Jivani
Published By : Jivani.org
शमशेर बहादुर सिंह आधुनिक हिंदी कविता के प्रगतिशील कवि हैं। ये हिंदी तथा उर्दू के विद्वान हैं। प्रयोगवाद और नई कविता के कवियों की प्रथम पंक्ति में इनका स्थान है। इनकी शैली अंग्रेज़ी कवि एजरा पाउण्ड से प्रभावित है। शमशेर बहादुर सिंह ‘दूसरा सप्तक’ (1951) के कवि हैं। शमशेर बहादुर सिंह ने कविताओं के समान ही चित्रों में भी प्रयोग किये हैं।
आधुनिक कविता में ‘अज्ञेय’ और शमशेर का कृतित्व दो भिन्न दिशाओं का परिचायक है- ‘अज्ञेय’ की कविता में वस्तु और रूपाकार दोनों के बीच संतुलन स्थापित रखने की प्रवृत्ति परिलक्षित होती है, शमशेर में शिल्प-कौशल के प्रति अतिरिक्त जागरूकता है। इस दृष्टि से शमशेर और ‘अज्ञेय’ क्रमशः दो आधुनिक अंग्रेज़ कवियों एजरा पाउण्ड और इलियट के अधिक निकट हैं।
आधुनिक अंग्रेज़ी-काव्य में शिल्प को प्राधान्य देने का श्रेय एजरा पाउण्ड को प्राप्त है। वस्तु की अपेक्षा रूपविधान के प्रति उनमें अधिक सजगता दृष्टिगोचर होती है। आधुनिक अंग्रेज़ी-काव्य में काव्य-शैली के नये प्रयोग एजरा पाउण्ड से प्रारम्भ होते हैं। शमशेर बहादुर सिंह ने अपने वक्तव्य में एजरा पाउण्ड के प्रभाव को मुक्तकण्ठ से स्वीकार किया है- टेकनीक में एजरा पाउण्ड शायद मेरा सबसे बड़ा आदर्श बन गया।
परिचय :
शमशेर बहादुर सिंह का जन्म देहरादून में 13 जनवरी, 1911 को हुआ। उनके पिता का नाम तारीफ सिंह था और माँ का नाम परम देवी था। शमशेर जी के भाई तेज बहादुर उनसे दो साल छोटे थे। उनकी माँ दोनों भाइयों को ‘राम-लक्ष्मण की जोड़ी’ कहा करती थीं। जब शमशेर बहादुर सिंह आठ या नौ वर्ष के ही थे, तब उनकी माँ की मृत्यु हो गई, किन्तु दोनों भाइयों की जोड़ी शमशेर की मृत्यु तक बनी रही।
शिक्षा :
आरंभिक शिक्षा देहरादून में हुई और हाईस्कूल-इंटर की परीक्षा गोंडा से दी। बी.ए. इलाहाबाद से किया, किन्हीं कारणों से एम.ए. फाइनल न कर सके। 1935-36 में उकील बंधुओं से पेंटिंग कला सीखी। ‘रूपाभ’, ‘कहानी’, ‘नया साहित्य’, ‘माया’, ‘नया पथ’, ‘मनोहर कहानियां’ आदि में संपादन सहयोग। उर्दू-हिन्दी कोश प्रोजेक्ट में संपादक रहे और विक्रम विश्वविद्यालय के ‘प्रेमचंद सृजनपीठ’ के अध्यक्ष रहे। दूसरा तार सप्तक के कवि हैं।
विवाह :
सन 1929 में 18 वर्ष की अवस्था में शमशेर बहादुर सिंह का विवाह धर्मवती के साथ हुआ, लेकिन छः वर्ष के बाद ही 1935 में उनकी पत्नी धर्मवती की मृत्यु टीबी के कारण हो गई। 24 वर्ष के शमशेर को मिला जीवन का यह अभाव कविता में विभाव बनकर हमेशा मौजूद रहा। काल ने जिसे छीन लिया था, उसे अपनी कविता में सजीव रखकर वे काल से होड़ लेते रहे। युवाकाल में शमशेर बहादुर सिंह वामपंथी विचारधारा और प्रगतिशील साहित्य से प्रभावित हुए थे। उनका जीवन निम्न मध्यवर्गीय व्यक्ति का था।
काव्य शैली :
शमशेर बहादुर सिंह में अपने बिम्बों, उपमानों और संगीतध्वनियों द्वारा चमत्कार और वैचित्र्यपूर्ण आधात् उत्पन्न करने की चेष्टा अवश्य उपलब्ध होती है, पर किसी केन्द्रगामी विचार-तत्व का उनमें प्रायः अभाव-सा है। अभिव्यक्ति की वक्रता द्वारा वर्ण-विग्रह और वर्ण-संधि के आधार पर नयी शब्द-योजना के प्रयोग से चामत्कारिक आघात देने की प्रवृत्ति इनमें किसी ठोस विचार तत्त्व की अपेक्षा अधिक महत्त्व रखती है।
शमशेर बहादुर सिंह में मुक्त साहचर्य और असम्बद्धताजन्य दुरूहता के तत्त्व साफ़ नज़र आते हैं। उनकी अभिव्यक्ति में अधूरापन परिलक्षित होता है। शमशेर की कविता में उलझनभरी संवेदनशीलता अधिक है। उनमें शब्द-मोह, शब्द-खिलवाड़ के प्रति अधिक जागरूकता है और शब्द- योजना के माध्यम से संगीत-ध्वनि उत्पन्न करने की प्रवृत्ति देखी जा सकती हैं।
आधुनिक काव्य-बोध :
शमशेर की कविताएँ आधुनिक काव्य-बोध के अधिक निकट हैं, जहाँ पाठक तथा श्रोता के सहयोग की स्थिति को स्वीकार किया जाता है। उनका बिम्बविधान एकदम जकड़ा हुआ ‘रेडीमेड’ नहीं है। वह ‘सामाजिक’ के आस्वादन को पूरी छूट देता है। इस दृष्टि से उनमें अमूर्तन की प्रवृत्ति अपने काफ़ी शुद्ध रूप में दिखाई देती है। उर्दू की गज़ल से प्रभावित होने पर भी उन्होंने काव्य-शिल्प के नवीनतम रूपों को अपनाया है।
प्रयोगवाद और नयी कविता के पुरस्कर्ताओं में वे अग्रणी हैं। उनकी रचनाप्रकृति हिन्दी में अप्रतिम है और अनेक सम्भावनाओं से युक्त है। हिन्दी के नये कवियों में उनका नाम प्रथम पांक्तोय है। ‘अज्ञेय’ के साथ शमशेर ने हिन्दी-कविताओं में रचना-पद्धति की नयी दिशाओं को उद्धाटित किया है और छायावादोत्तर काव्य को एक गति प्रदान की है।
विचारधारा :
शमशेर बहादुर सिंह हिन्दी साहित्य में माँसल एंद्रीए सौंदर्य के अद्वीतीय चितेरे और आजीवन प्रगतिवादी विचारधारा के समर्थक रहे। उन्होंने स्वाधीनता और क्रांति को अपनी निजी चीज़ की तरह अपनाया। इंद्रिय सौंदर्य के सबसे संवेदनापूर्ण चित्र देकर भी वे अज्ञेय की तरह सौंदर्यवादी नहीं हैं। उनमें एक ऐसा ठोसपन है, जो उनकी विनम्रता को ढुलमुल नहीं बनने देता। साथ ही किसी एक चौखटे में बंधने भी नहीं देता। सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ उनके प्रिय कवि थे। उन्हें याद करते हुए शमशेर बहादुर सिंह ने लिखा था - “भूल कर जब राह, जब-जब राह.. भटका मैं/ तुम्हीं झलके हे महाकवि,/ सघन तम की आंख बन मेरे लिए।”
शमशेर के राग-विराग गहरे और स्थायी थे। अवसरवादी ढंग से विचारों को अपनाना, छोड़ना उनका काम नहीं था। अपने मित्र और कवि केदारनाथ अग्रवाल की तरह वे एक तरफ़ ‘यौवन की उमड़ती यमुनाएं’ अनुभव कर सकते थे, वहीं दूसरी ओर ‘लहू भरे ग्वालियर के बाज़ार में जुलूस’ भी देख सकते थे। उनके लिए निजता और सामाजिकता में अलगाव और विरोध नहीं था, बल्कि दोनों एक ही अस्तित्व के दो छोर थे। शमशेर बहादुर सिंह उन कवियों में से थे, जिनके लिए मार्क्सवाद की क्रांतिकारी आस्था और भारत की सुदीर्घ सांस्कृतिक परंपरा में विरोध नहीं था।
आधुनिक कविता में ‘अज्ञेय’ और शमशेर का कृतित्व दो भिन्न दिशाओं का परिचायक है- ‘अज्ञेय’ की कविता में वस्तु और रूपाकार दोनों के बीच संतुलन स्थापित रखने की प्रवृत्ति परिलक्षित होती है, शमशेर में शिल्प-कौशल के प्रति अतिरिक्त जागरूकता है। इस दृष्टि से शमशेर और ‘अज्ञेय’ क्रमशः दो आधुनिक अंग्रेज़ कवियों एजरा पाउण्ड और इलियट के अधिक निकट हैं।
आधुनिक अंग्रेज़ी-काव्य में शिल्प को प्राधान्य देने का श्रेय एजरा पाउण्ड को प्राप्त है। वस्तु की अपेक्षा रूपविधान के प्रति उनमें अधिक सजगता दृष्टिगोचर होती है। आधुनिक अंग्रेज़ी-काव्य में काव्य-शैली के नये प्रयोग एजरा पाउण्ड से प्रारम्भ होते हैं। शमशेर बहादुर सिंह ने अपने वक्तव्य में एजरा पाउण्ड के प्रभाव को मुक्तकण्ठ से स्वीकार किया है- टेकनीक में एजरा पाउण्ड शायद मेरा सबसे बड़ा आदर्श बन गया।
परिचय :
शमशेर बहादुर सिंह का जन्म देहरादून में 13 जनवरी, 1911 को हुआ। उनके पिता का नाम तारीफ सिंह था और माँ का नाम परम देवी था। शमशेर जी के भाई तेज बहादुर उनसे दो साल छोटे थे। उनकी माँ दोनों भाइयों को ‘राम-लक्ष्मण की जोड़ी’ कहा करती थीं। जब शमशेर बहादुर सिंह आठ या नौ वर्ष के ही थे, तब उनकी माँ की मृत्यु हो गई, किन्तु दोनों भाइयों की जोड़ी शमशेर की मृत्यु तक बनी रही।
शिक्षा :
आरंभिक शिक्षा देहरादून में हुई और हाईस्कूल-इंटर की परीक्षा गोंडा से दी। बी.ए. इलाहाबाद से किया, किन्हीं कारणों से एम.ए. फाइनल न कर सके। 1935-36 में उकील बंधुओं से पेंटिंग कला सीखी। ‘रूपाभ’, ‘कहानी’, ‘नया साहित्य’, ‘माया’, ‘नया पथ’, ‘मनोहर कहानियां’ आदि में संपादन सहयोग। उर्दू-हिन्दी कोश प्रोजेक्ट में संपादक रहे और विक्रम विश्वविद्यालय के ‘प्रेमचंद सृजनपीठ’ के अध्यक्ष रहे। दूसरा तार सप्तक के कवि हैं।
विवाह :
सन 1929 में 18 वर्ष की अवस्था में शमशेर बहादुर सिंह का विवाह धर्मवती के साथ हुआ, लेकिन छः वर्ष के बाद ही 1935 में उनकी पत्नी धर्मवती की मृत्यु टीबी के कारण हो गई। 24 वर्ष के शमशेर को मिला जीवन का यह अभाव कविता में विभाव बनकर हमेशा मौजूद रहा। काल ने जिसे छीन लिया था, उसे अपनी कविता में सजीव रखकर वे काल से होड़ लेते रहे। युवाकाल में शमशेर बहादुर सिंह वामपंथी विचारधारा और प्रगतिशील साहित्य से प्रभावित हुए थे। उनका जीवन निम्न मध्यवर्गीय व्यक्ति का था।
काव्य शैली :
शमशेर बहादुर सिंह में अपने बिम्बों, उपमानों और संगीतध्वनियों द्वारा चमत्कार और वैचित्र्यपूर्ण आधात् उत्पन्न करने की चेष्टा अवश्य उपलब्ध होती है, पर किसी केन्द्रगामी विचार-तत्व का उनमें प्रायः अभाव-सा है। अभिव्यक्ति की वक्रता द्वारा वर्ण-विग्रह और वर्ण-संधि के आधार पर नयी शब्द-योजना के प्रयोग से चामत्कारिक आघात देने की प्रवृत्ति इनमें किसी ठोस विचार तत्त्व की अपेक्षा अधिक महत्त्व रखती है।
शमशेर बहादुर सिंह में मुक्त साहचर्य और असम्बद्धताजन्य दुरूहता के तत्त्व साफ़ नज़र आते हैं। उनकी अभिव्यक्ति में अधूरापन परिलक्षित होता है। शमशेर की कविता में उलझनभरी संवेदनशीलता अधिक है। उनमें शब्द-मोह, शब्द-खिलवाड़ के प्रति अधिक जागरूकता है और शब्द- योजना के माध्यम से संगीत-ध्वनि उत्पन्न करने की प्रवृत्ति देखी जा सकती हैं।
आधुनिक काव्य-बोध :
शमशेर की कविताएँ आधुनिक काव्य-बोध के अधिक निकट हैं, जहाँ पाठक तथा श्रोता के सहयोग की स्थिति को स्वीकार किया जाता है। उनका बिम्बविधान एकदम जकड़ा हुआ ‘रेडीमेड’ नहीं है। वह ‘सामाजिक’ के आस्वादन को पूरी छूट देता है। इस दृष्टि से उनमें अमूर्तन की प्रवृत्ति अपने काफ़ी शुद्ध रूप में दिखाई देती है। उर्दू की गज़ल से प्रभावित होने पर भी उन्होंने काव्य-शिल्प के नवीनतम रूपों को अपनाया है।
प्रयोगवाद और नयी कविता के पुरस्कर्ताओं में वे अग्रणी हैं। उनकी रचनाप्रकृति हिन्दी में अप्रतिम है और अनेक सम्भावनाओं से युक्त है। हिन्दी के नये कवियों में उनका नाम प्रथम पांक्तोय है। ‘अज्ञेय’ के साथ शमशेर ने हिन्दी-कविताओं में रचना-पद्धति की नयी दिशाओं को उद्धाटित किया है और छायावादोत्तर काव्य को एक गति प्रदान की है।
विचारधारा :
शमशेर बहादुर सिंह हिन्दी साहित्य में माँसल एंद्रीए सौंदर्य के अद्वीतीय चितेरे और आजीवन प्रगतिवादी विचारधारा के समर्थक रहे। उन्होंने स्वाधीनता और क्रांति को अपनी निजी चीज़ की तरह अपनाया। इंद्रिय सौंदर्य के सबसे संवेदनापूर्ण चित्र देकर भी वे अज्ञेय की तरह सौंदर्यवादी नहीं हैं। उनमें एक ऐसा ठोसपन है, जो उनकी विनम्रता को ढुलमुल नहीं बनने देता। साथ ही किसी एक चौखटे में बंधने भी नहीं देता। सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ उनके प्रिय कवि थे। उन्हें याद करते हुए शमशेर बहादुर सिंह ने लिखा था - “भूल कर जब राह, जब-जब राह.. भटका मैं/ तुम्हीं झलके हे महाकवि,/ सघन तम की आंख बन मेरे लिए।”
शमशेर के राग-विराग गहरे और स्थायी थे। अवसरवादी ढंग से विचारों को अपनाना, छोड़ना उनका काम नहीं था। अपने मित्र और कवि केदारनाथ अग्रवाल की तरह वे एक तरफ़ ‘यौवन की उमड़ती यमुनाएं’ अनुभव कर सकते थे, वहीं दूसरी ओर ‘लहू भरे ग्वालियर के बाज़ार में जुलूस’ भी देख सकते थे। उनके लिए निजता और सामाजिकता में अलगाव और विरोध नहीं था, बल्कि दोनों एक ही अस्तित्व के दो छोर थे। शमशेर बहादुर सिंह उन कवियों में से थे, जिनके लिए मार्क्सवाद की क्रांतिकारी आस्था और भारत की सुदीर्घ सांस्कृतिक परंपरा में विरोध नहीं था।
काव्य-कृतियां :
1. ‘कुछ कविताएं’ (1956)
2. ‘कुछ और कविताएं’ (1961)
3. ‘शमशेर बहादुर सिंह की कविताएं’ (1972)
4. ‘इतने पास अपने’ (1980)
5. ‘उदिता : अभिव्यक्ति का संघर्ष’ (1980)
6. ‘चुका भी हूं नहीं मैं’ (1981)
7. ‘बात बोलेगी’ (1981)
8. ‘काल तुझसे होड़ है मेरी’ (1988)
9. ‘शमशेर की ग़ज़लें
गद्य रचना :
1. ‘दोआब’ निबंध- संग्रह (1948)
2. ‘प्लाट का मोर्चा’ कहानियां व स्केच (1952)
3. ‘शमशेर की डायरी।’
4. अनुवाद
5. सरशार के उर्दू उपन्यास ‘कामिनी’
6. ‘हुशू’
7. ‘पी कहां।’
8. एज़ाज़ हुसैन द्वारा लिखित उर्दू साहित्य का इतिहास ।
9. ‘षडयंत्र’ (सोवियत संघ-विरोधी गतिविधियों का इतिहास)
10. ‘वान्दावासिलवास्का’ (रूसी) के उपन्यास ‘पृथ्वी और आकाश’





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