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Showing posts from March, 2020

धर्मवीर भारति

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टूटा पहिया ( क विता ) - ध र्मवीर भारती मैं रथ का टूटा हुआ पहिया हूँ लेकिन मुझे फेंको मत  ! क्या जाने कब इस दुरूह चक्रव्यूह में अक्षौहिणी सेनाओं को चुनौती देता हुआ कोई दुस्साहसी अभिमन्यु आकर घिर जाय  ! अपने पक्ष को असत्य जानते हुए भी बड़े-बड़े महारथी अकेली निहत्थी आवाज़ को अपने ब्रह्मास्त्रों से कुचल देना चाहें तब मैं रथ का टूटा हुआ पहिया उसके हाथों में ब्रह्मास्त्रों से लोहा ले सकता हूँ  ! मैं रथ का टूटा पहिया हूँ लेकिन मुझे फेंको मत इतिहासों की सामूहिक गति सहसा झूठी पड़ जाने पर क्या जाने सच्चाई टूटे हुए पहियों का आश्रय ले  ! कविता का सारांश ध र्मवीर भारती हिं दी साहित्य के प्रयोगि वादी क वियों में प्रमुख हैं | टूटा पहिया ध र्मवीर भारती की बहु चर्चित कविता है। टूटा पहिया लघु और उ पेक्षित मा नव का प्रतीक है , जिसे बेकार समझकर फेंक दिया जाता है | लघु मानव को कव्यनायक बनाना प्रयोगवादी कवियों का प्रमुख प्रवृत्ति रहा है।   टूटा पहिया एक प्रतीकात्मक कविता है। इस कविता के प्रतीक को कवि ने महाभा...

शमशेर बहादुर सिंह

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एक पीली शाम :  शमशेर बहादुर सिंह   एक पीली शाम                 पतझर का जरा अटका हुआ पत्ता   शांत   मेरी भावनाओं में तुम्हारा मुखकमल   कृंश ग्लान  हारा-सा           ( कि मैं हूं एक मौन दर्पण में                       तुम्हारे कहीं ?)             वासना डूबी             शिथिल पल में             स्नेह काजल में             लिए अद्भुत रूप - कोमलता   अब गिरा अब गिरा वह अटका हुआ आंसू   सांध्य  तारक - सा             अतल में |                              { शमशेर बहादुर सिंह } कविता का सारांश       " एक पीली शाम " कविता का कवि शम...